HYMNS TO VISHNU – SRI DEENABANDHU ASHTAKAM

३.  श्रीदीनबन्ध्वष्टकम्
     (स्वामि ब्रह्मानन्दकृतम्)
 
यस्मादिदं जगदुदॆति चतुर्मुखाद्यम्
यस्मिन्नवस्थितमशॆषमशॆषमूलॆ ।
यत्रॊपयाति विलयं च समस्तमन्तॆ
दृग्गॊचरॊ भवतु मॆऽद्य स दीनभन्धुः ॥ १ ॥                
चक्रं सहस्रकरचारु करारविन्दॆ
गुर्वी गदा दरवरश्च विभाति यस्य ।
पक्षीन्द्रपृष्ठपरिरॊपितपादपद्मॊ
दृग्गॊचरॊ भवतु मॆऽद्य स दीनभन्धुः ॥ २ ॥                
यॆनॊद्धृता वसुमती सलिलॆ निमग्ना
नग्ना च पाण्डववधूः स्थगिता दुकूलैः ।
सम्मॊचितॊ जलचरस्य मुखाद्गजॆन्द्रॊ
दृग्गॊचरॊ भवतु मॆऽद्य स दीनभन्धुः ॥ ३ ॥                 
यस्यार्द्रदृष्टिवशतस्तु सुराः समृद्धिम्
कॊपॆक्षणॆन दनुजा विलयं व्रजन्ति ।
भीताश्चरन्ति च यतॊऽर्कयमानिलाद्या
दृग्गॊचरॊ भवतु मॆऽद्य स दीनभन्धुः ॥ ४ ॥                 
गायन्ति सामकुशला यमजं मखॆषु
ध्यायन्ति धीरमतयॊ यतयॊ विविक्तॆ ।
पश्यन्ति यॊगिपुरुषाः पुरुषं शरीरॆ
दृग्गॊचरॊ भवतु मॆऽद्य स दीनभन्धुः ॥ ५ ॥                
आकाररूपगुणयॊगविवर्जितॊऽपि
भक्तानुकम्पननिमित्तगृहीतमूर्तिः ।
यः सर्वगॊऽपि कृतशॆषशरीरशय्यॊ
दृग्गॊचरॊ भवतु मॆऽद्य स दीनभन्धुः ॥ ६ ॥                
यस्याङ्घ्रिपङ्कजमनिद्रमुनीन्द्रवृन्दै-
राराध्यतॆ भवदवानलदाहशान्त्यै ।
सर्वापराधमविचिन्त्य ममाखिलात्मा
दृग्गॊचरॊ भवतु मॆऽद्य स दीनभन्धुः ॥ ७ ॥                
यन्नामकीर्तनपरः श्वपचॊऽपि नूनम्
हित्वाखिलं कलिमलं भुवनं पुनाति ।
दग्ध्वा ममाघमखिलं करुणॆक्षणॆन
दृग्गॊचरॊ भवतु मॆऽद्य स दीनभन्धुः ॥ ८ ॥                 
दीनबन्ध्वष्टकं पुण्यं ब्रह्मानन्दॆन भाषितम् ।
यः पठेत् प्रयतॊ नित्यं तस्य विष्णुः प्रसीदति ॥ ९ ॥

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