ANNAPOORNA STOTRAM

२०. अन्नपूर्णास्तोत्रम्

        (श्री शंकराचार्यकृतम्)

नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी

निर्धूताखिलघोरपापनिकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी ।

प्रालॆयाचलवंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरी

भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ १ ॥

नानारत्नविचित्रभूषणकरी हेमाम्बराडम्बरी

मुक्ताहार-विलम्बमान-विलसद्-वक्षॊजकुम्भान्तरी ।

काश्मीरागरुवासितारुचिकरी काशीपुराधीश्वरी

भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ २ ॥

         

योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्मैकनिष्ठाकरी

चन्द्रार्कानलभासमानलहरी त्रैलोक्यरक्षाकरी ।

सर्वैश्वर्यकरी तपःफलकरी काशीपुराधीश्वरी

भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ३ ॥

         

कैलासाचलकन्दरालयकरी गौरी ह्युमा शंकरी

कौमारी निगमार्थगोचरकरी ओंकारबीजाक्षरी ।

मोक्षद्वारकवाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरी

भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ४ ॥

         

दृश्यादृश्यविभूतिभावनकरी ब्रह्माण्डभाण्डोदरी

लीलानाटकसूत्रखेलनकरी विज्ञानदीपाङ्कुरी ।

श्रीविश्वेशमनःप्रसादनकरी काशीपुराधीश्वरी

भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी  ॥ ५ ॥

         

उर्वी सर्वजनेश्वरी जयकरी माता कृपासगरी

नारी नीलसमानकुन्तलधरी नित्यान्नदानेश्वरी ।

सर्वानन्दकरी दशाशुभकरी काशीपुराधीश्वरी

भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ६ ॥

         

आदिक्षान्तसमस्तवर्णनिकरी शंभोस्त्रिभावाकरी

काश्मीरा त्रिपुरेश्वरी त्रिलहरी नित्याङ्कुरी शर्वरी ।

कामाकाङ्क्षकरी जनोदयकरी काशीपुराधीश्वरी

भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी   ॥ ७ ॥

         

देवी सर्वविचित्ररत्नरुचिरा दाक्षायणी सुन्दरी

वामा स्वादुपयोधरा प्रियकरी सौभाग्यमाहेश्वरी ।

भक्ताभीष्टकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी

भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ८ ॥

         

चन्द्रार्कानलकोटिकोटिसदृशा चन्द्रांशुबिम्बाधरी

चन्द्रार्काग्निसमानकुण्डलधरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी ।

मालापुस्तकपाशकाङ्कुशधरी काशीपुराधीश्वरी

भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ९ ॥

         

क्षत्रत्राणकरी महाभयकरी माता कृपासागरी

साक्षान्मोक्षकरी सदाशिवकरी विश्वेश्वरी श्रीधरी ।

दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरी

भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ १० ॥

         

अन्नपूर्णे सदापूर्णे

शंकरप्राणवल्लभे ।

ज्ञानवैराग्यसिध्यर्थं

भिक्षां देही च पार्वति ॥ ११ ॥

माता च पर्वती देवी

पिता देवो महेश्वरः ।

बान्धवाः शिवभक्ताश्च

स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥ १२ ॥

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