MAHANARAYANOPANISHAD- MRITTIKA SUKTAM

                      मृत्तिकासूक्तम्             
                  (महानारायणोपनिषत्)
भूमि-र्धेनुर्धरिणी लोकधारिणी ।
उद्धृतोऽसि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना।
मृत्तिके  हर मे पापं यन्मया दुष्कृतं कृतम्।
मृत्तिके ब्रह्मदत्ताऽसि
काश्यपेनाभिमन्त्रिता।
मृत्तिके देहि मे पुष्टिं त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।
मृत्तिके प्रतिष्ठितं सर्वं तन्मे निणुदि मृत्तिके।

 तया हतेन पापेन गच्छामि
परमां गतिम्॥  

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