MAHANARAYANOPANISHAD-MRITYUNIVARANA MANTRAH

                                 मृत्युनिवारणमन्त्राः
                      
          (महानारायणोपनिषत्)
अपैतु मृत्यु-रमृतं न आगन्वैवस्वतो
नो अभयं कृणोतु। पर्णं वनस्पते-रिवाभिन-श्शीयताँ रयि-स्सचता-न्न-श्शचीपतिः॥
परं मृत्यो अनुपरे हि पन्थां
यस्ते स्व इतरो देवयानात्। चक्षुष्मते शृण्वते ते ब्रवीमि मा नः प्रजाँ रीरिषो  मोत वीरान्॥
वातं प्राणं मनसाऽन्वा रभामहे
प्रजापतिं यो भुवनस्य गोपाः। स नो मृत्यो स्त्रायतां पात्वँहसो ज्योग्जीवा जरा-मशीमहि॥
अमुत्र भूया-दध यद्यमस्य
बृहस्पते अभिशस्तेरमुञ्चः। प्रत्यौहता मश्विना मृत्यु-मस्मा-द्देवाना-मग्ने भिषजा
शचीभिः॥
हरिँ हरन्त-मनुयन्ति
देवा विश्वस्येशानं वृषभं मतीनाम्। ब्रह्म सरूप-मनुमेद-मागा-दयनं माविवधी-र्विक्रमस्य॥
शल्कैरग्नि-मिन्धान उभौ
लोकौ सनेमहम्। उभयोर्लोकयोर् ऋध्वाऽतिमृत्युं तराम्यहम्॥
मा छिदो मृत्यो मावधी-र्मा मे बलं
विवृहो मा प्रमोषीः । प्रजां मामे रीरिष आयु-रुग्र नृचक्षसं
त्वा हविषा विधेम ॥
मा नो महान्त-मुत मा नो
अर्भकं मान उक्षन्त मुतमान उक्षितम्। मानो वधीः पितरं मोत मातरं प्रिया मानस्तनुवो
रुद्र रीरिषः॥
मा न-स्तोके तनये
मान आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः। वीरान्मानो रुद्रभामितो वधीर् हविष्मन्तो
नमसा विधेमते॥ 

 

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