MAHANARAYANOPANISHAD-VIRAJAHOMA MANTRAAH

               विरजाहोममन्त्राः
      (महानारायणोपनिषत्)
    
तिलाञ्जुहोमि सरसाँ सपिष्टान्
गन्धार मम चित्ते रमन्तु स्वाहा। गावो हिरण्यं धन-मन्नपानँ
सर्वेषाँ श्रियै स्वाहा। श्रियं च लक्ष्मिं च पुष्टिं च कीर्तिं चानृण्यताम् । ब्रह्मण्यं
बहुपुत्रताम्। श्रद्धा मेधे प्रजा-स्सन्ददातु स्वाहा॥ 
तिलाः क्रुष्णा-स्तिला-श्वेतास्तिला-स्सौम्या
वशानुगा। तिलाः पुनन्तु मे पापं यत्किञ्चिद् दुरितं मयि स्वाहा। चोरस्यान्नं नवश्राद्धं  ब्रह्महा गुरुतल्पगः। गोस्तेयँ सुरापानं भ्रूणहत्या
तिला शान्तिँ शमयतु स्वाहा। श्रीश्च लक्ष्मीश्च पुष्टिश्च कीर्तिं-चानृण्यताम्। ब्रह्मण्यं
बहुपात्रताम्। श्रद्धामेधे प्रज्ञातु जातवेद-स्संददातु स्वाहा॥
प्राणापान-व्यानोदान-समाना
मे शुध्यन्तां ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासँ स्वाहा॥ त्वक्चर्म-माँस-रुधिर-मेदो-मज्जा-स्नायवो-ऽस्थीनि
मे शुध्यन्तां ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासँ स्वाहा॥ शिरः-पाणि-पाद-पार्श्वपृष्ठोरूदर-जङ्घशिश्नोपस्थ-पायवो
मे शुध्यन्तां ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासँ स्वाहा॥ उत्तिष्ठ पुरुष हरितपिङ्गल
लोहिताक्षि देहि देहि ददापयिता मे शुध्यन्तां ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासँ स्वाहा॥
पृथिव्याप-स्तेजो-वायु-राकाशा
मे शुध्यन्तां ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासँ स्वाहा॥ शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धा मे
शुध्यन्तां ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासँ स्वाहा॥मनो-वाक्काय-कर्माणि मे शुध्यन्तां
ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासँ स्वाहा॥ अव्यक्तभावै-रहंकारै-र्ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा
भूयासँ स्वाहा।  आत्मा मे शुध्यन्तां ज्योतिरहं
विरजा विपाप्मा भूयासँ स्वाहा।अन्तरात्मा मे शुध्यन्तां ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासँ
स्वाहा। परमात्मा मे शुध्यन्तां ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासँ स्वाहा।क्षुधे स्वाहा।
क्षुत्पिपासाय स्वाहा। विविट्ट्यै स्वाहा । 
ऋग्विधानाय स्वाहा। कषोत्काय स्वाहा। क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठा-मलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम्।
अभूति-मसमृद्धिं च सर्वा-न्निर्णुद मे पाप्मानँ स्वाहा।
अन्नमय-प्राणमय-मनोमय-विज्ञानमय-मानन्दमय-मात्मा
मे शुध्यन्तां ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासँ स्वाहा॥

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