MAHANARAYANOPANISHAD-VYAHRITIHOMA MANTRAH ETC.

 व्याहृति-होममन्त्राः             
    (महानारायणोपनिषत्)
भू-रन्न-मग्नये पृथिव्यै स्वाहा भुवोऽन्नं वायवेऽन्तरिक्षाय स्वाहा सुवरन्न-मादित्याय दिवे स्वाहा भू-र्भुवस्सुव-रन्नं चन्द्रमसे दिग्भ्य-स्स्वाहा नमो देवेभ्य
स्स्वधया पितृभ्यो भू-र्भुवि स्सुव-रन्नमोम्॥
भू-रग्नये पृथिव्यै स्वाहा भुवो वायवेऽन्तरिक्षाय स्वाहा सुवरादित्याय दिवे स्वाहा
भू-र्भुवस्सुव-श्चन्द्रमसे दिग्भ्य-स्स्वाहा नमो देवेभ्य-स्स्वधा पितृभ्यो भू-र्भुवस्सुव-रग्न ओम्॥
भूरग्नये च पृथिव्यै च महते च स्वाहा भुवो वायवे चान्तरिक्षाय च महते च स्वाहा । सुवरादित्याय च दिवे च महते च स्वाहा भू-र्भुवस्सुव-श्चन्द्रमसे
च नक्षत्रेभ्यश्च दिग्भ्यश्च महते च स्वाहा  नमो देवेभ्य-स्स्वधा पितृभ्यो भू-र्भुव-स्सुव-र्महरोम् ॥
               ज्ञानप्राप्त्यर्था-होममन्त्राः
पाहि नो अग्न एनसे स्वाहा। पाहि नो विश्ववेदसे स्वाहा । यज्ञं पाहि विभावसो स्वाहा। सर्वं पाहि शतक्रतो स्वाहा॥
पाहि नो अग्न एकया। पाह्युत द्वितीयया। पाह्यूर्जं तृतीयया। पाहि गीर्भिश्च तसृभि-र्वसो स्वाहा ॥
                वेदाविस्मरणाय जपमन्त्राः
यस्छन्दसामृषभो विश्वरूप-श्छन्दोभ्य-श्छन्दाँस्याविवेश। सचाँशिक्यः पुरो वाचोपनिष-दिन्द्रो ज्येष्ठ इन्द्रियाय ऋषिभ्यो नमो देवेभ्यस्स्वधा पितृभ्यो भूर्भुव-स्सुव-श्छ्न्द ओम्॥
नमो ब्रह्मणे धारणं मे अस्त्वनिराकरणं धारयिता भूयासं कर्णयो-श्श्रुतं माच्योढ्वं
ममामुष्य ओम् ॥
                तपः प्रशंसा
ऋतं तप-स्स्त्यं तप-श्श्रुतं तपश्शान्तं तपो दम-स्तपश्शामस्तपो दानं तपो यज्ञं तपो भूर्भुवस्सुव-र्ब्रह्मैतदुपास्यैतत्तपः ॥
                विहिताचारप्रशंसा निषिद्धाचारनिन्दा च
यथा वृक्षस्य संपुष्पितस्य दूरा-द्गन्धो वात्येवं पुण्यस्य कर्मणो दूराद्गन्धो  वाति यथा ऽसिधारां कर्तेऽवहिता-मवक्रामे यद्युवे युवे हवा विह्वयिष्यामि कर्तं पतिष्यामीत्येव-ममृता-दात्मानं जुगुप्सेत् ॥
                

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