GARUDA PANCHASAT (BY VEDANTA DESIKA)

                                                ॥ श्रीगरुडपञ्चाशत्॥
                 श्रीमते निगमान्तदेशिकाय नमः
            श्रीमान् वेङ्कटनाथार्यः कवितार्किककेसरी।
            वेदान्ताचार्यवर्यो मे सन्निधत्तां सदा हृदि॥ 
                     
परव्यूहवर्णकः
       अङ्गेष्वानन्द मुख्य श्रुतिशिखर मिळद्दण्डकं गण्डपूर्वं 
           प्रागेवाभ्यस्य षट्सु प्रतिदिशमनघं न्यस्त शुद्धास्त्र बन्धाः।
       पक्षि व्यत्यस्त पक्षि द्वितय मुख पुट प्रस्फुटोदार तारं
           मन्त्रं गारुत्मतं तं हुतवहदयिता शेखरं शीलयामः ॥१॥
       वेदः स्वार्थाधिरूढो बहिरबहिरभिव्यक्तिमभ्येति यस्यां
          सिद्धिः सांकर्षणी सा परिणमति यया सापवर्ग त्रिवर्गा।
       प्राणस्य प्राणमन्यं प्रणिहितमनसो यत्र निर्धारयन्ति
          प्राची सा ब्रह्मविद्या परिचितगहना पातु गारुत्मती नः ॥२॥         
   
        नेत्रं गायत्रमूचे त्रिवृदिति च शिरो नामधेयं यजूंषि
           छन्दांस्यङ्गानि धिष्ण्यात्मभिरजनि शफैर्विग्रहो वामदेव्यम्।
        यस्य स्तोमात्मनोऽसौ बृहदितरगरुत् तादृशाम्नातपुच्छः
           स्वाच्छन्द्यं नः प्रसूतां श्रुतिशतशिखराभिष्टुतात्मा गरुत्मान् ॥३॥
        यो यं धत्ते स्वनिष्ठं वहनमपि वरः स्पर्शितो येन यस्मै
           यस्माद् यस्याहवश्रीर्विदधति भजनं यत्र यत्रेति सन्तः।
        प्रायो देवः स इत्थं हरिगरुड भिदा कल्पितारोह वाह-
           स्वाभाव्यः स्वात्मभव्यः प्रदिशतु शकुनिर्ब्रह्म सब्रह्मतां नः॥४॥
     
        एको विष्णोर्द्वितीयस्त्रि चतुर विदितं पञ्चवर्णि रहस्यं
           षाड्गुण्य स्मेर सप्त स्वर गतिरणिमाद्यष्ट संपन्नवात्मा।
        देवो दर्वीकरारिर्दश शत नयनारातिसाहस्रलक्षे
           विक्रीडत्पक्ष कोटिर्विघटयतु भयं वीतसंख्योदयो नः ॥५॥
        सत्याद्यैः सात्वतादि प्रथितमहिमभिः पञ्चभिर्व्यूहभेदैः
           पञ्चाभिख्यो निरुन्धन् भवगरल भवं प्राणिनां पञ्चभावम्।
        प्राणापानादि भेदात् प्रतितनु मरुतो दैवतं पञ्च वृत्तेः
           पञ्चात्मा पञ्चधाऽसौ पुरुष उपनिषद्घोषितस्तोषयेन्नः ॥६॥           
    
   श्लिष्यद्भोगीन्द्रभोगे श्रुतिनिकरनिधौ मूर्तिभेदे स्वकीये
           वर्णव्यक्तीर्विचित्राः परिकलयति यो वक्त्रबाहूरुपादैः।
        प्राणः सर्वस्य जन्तोः प्रकटितपरमब्रह्मभावः स इत्थं
           क्लेशं छिन्दन् खगेशः सपदि विपदि नः सन्निधिः सन्निधत्ताम्॥७॥
       अग्रे तिष्ठन् उदग्रो मणिमुकुर इवानन्य दृष्टेर्मुरारेः
            पायान्माया भुजङ्गी विषम विष भयाद् गाढमस्मान् गरुत्मान्।
       क्षुभ्यत्क्षीराब्धि पाथस्सहभव  गरल स्पर्शशङ्की स शङ्के

           छायां
धत्ते यदीयां हृदि हरि हृदयारोह धन्यो मणीन्द्रः ॥८॥
        संबध्नन्त्या
तनुत्रं सुचरितमशनं पख्खणं निर्दिशन्त्या।
प्रत्युद्यद्भिल्लपल्ली भट रुधिर सरिल्लोल कल्लोल माला-
  अङ्गैरेव स्वकीयैरहमहमिकया
मानितो वैनतेयः ॥२२॥

                     
अमृताहरणवर्णकः           
    
        आहर्तारं सुधाया दुरधिगम महाचक्र दुर्गस्थितायाः
            जेतारं वज्रपाणेः सह विबुधगणैराहवे बाहुवेगात्।
        विष्णौ संप्रीयमाणे वरविनिमयतो विश्वविख्यातकीर्ति
            देवं याऽसूत साऽसौ दिशतु भगवती शर्म दाक्षायणी नः ॥९॥  
              
        वित्रासाद् वीतिहोत्रं प्रथममधिगतैरन्तिके मन्दधाम्ना
           भूयस्तेनैव सार्धं भयभरतरलैर्वन्दितो देववृन्दैः।
         कल्पान्त क्षोभदक्षं कथमपि कृपया संक्षिपन् धाम चण्डं
            भित्त्वाऽण्डं
निर्जिहानो भवभयमिह नः खण्डयत्वण्डजेन्द्रः ॥१०॥
         क्षुण्ण क्षोणीधाराणि क्षुभित चतुरकूपार तिम्यद्गरुन्ति
              त्रुट्यत्तारासराणि स्थपुटित विबुधस्थानकानि क्षिपेयुः।
         पातालब्रह्मसौधावधि विहित मुधाऽऽवर्तनान्यस्मदार्ति
              ब्रह्माण्डस्यान्तराले बृहति खगपतेरर्भकक्रीदितानि ॥११॥
     संविच्छस्त्रं दिशन्त्या सह विजय चमूराशिषः प्रेषयन्त्या
     एनोऽस्मद्वैनतेयो नुदतु विनतया कॢप्तरक्षाविशेषः
        कद्रू संकेत दास्य क्षपण पण
सुधा लक्ष भैक्षं जिघृक्षुः॥१२॥
    विक्षेपैः पक्षतीनां अनिभृत गतिभिर्वादित व्योमतूर्यः
       वाचालाम्भोधि वीचीवलय विरचितालोक शब्दानुबन्धः।
    दिक्कन्या कीर्यमाण क्षरदुडु निकर व्याज लाजाभिषेकः
      नाकोन्माथाय गच्छन् नरकमपि स मे नागहन्ता निहन्तु॥१३॥
   
   ऋक्षाक्ष क्षेप दक्षो मिहिर हिमकरोत्ताल तालाभिघाती
     वेलावाः केळि लोलो विविध घनघटा कन्दुकाघातशीलः।
   पायान्नः पातकेभ्यः पतगकुलपतेः पक्षविक्षेपजातः
     वातः पाताळ 
हेलापटह पटुरवारम्भ संरम्भ धीरः ॥१४॥    
  
  किं निर्घातः किमर्कः परिपतति दिवः किं समिद्धोऽयमौर्वः
     किंस्वित् कार्तस्वराद्रिर्ननु विदितमिदं व्योमवर्त्मा गरुत्मान्।
  आसीदत्याजिहीर्षत्यभिपतति हरत्यत्ति हा तात हाऽम्बेति
     आलापोद्युक्त भिल्लाकुल जठर पुटः पातु नः पत्रिनाथः ॥१५॥
आसृक्व्याप्तैरसृग्भिर्दुरुपशम तृषा शातनी शातदंष्ट्रा-
   कोटी लोटत्करोटी विकट कटकाराव घोरावतारा।
भिन्द्यात् सार्धं पुळिन्द्या सपदि परिहृत ब्रह्मका जिह्मगारेः
   उद्वेल्लद्भिल्ल पल्ली निगरण करणा पारणा कारणां नः ॥१६॥
स्वच्छन्द स्वर्गिबृन्द प्रथमतम महोत्पात निर्घात घोरः
   स्वान्तध्वान्तं निरुन्ध्यात् धुत धरणि पयोराशिराशीविषारेः।
   हाला निर्वेश हेला हसहल बहुलो हर्ष कोलाहलो नः ॥१७॥
सान्द्र क्रोधानुबन्धात् सरसि नखमुखे पादपे गण्डशैले
  तुण्डाग्रे कण्ठरन्ध्रे तदनु च जठरे निर्विशेषं युयुत्सू।
अव्यादस्मान् अभव्यादविदित नखर श्रेणिदंष्ट्राभिघातौ
  जीवग्राहं ग्रुहीत्वा कमठकरटिनौ भक्षयन्  पक्षिमल्लः ॥१८॥
अल्पः कल्पान्तलीला नटमकुट सुधासूति खण्डो बहूनां
  निःसारस्त्वद्भुजाद्रेरनुभवतु मुधा  मन्थनं त्वेष सिन्धुः।
राका चन्द्रस्तु राहोः स्वमिति कथयतः प्रेक्ष्य कद्रूकुमारान्
  सान्तर्हासं खगेन्द्रः सपदि हृतसुधस्त्रायतां आयतान्नः ॥१९॥
आरादभ्युत्थितैरावतम् अमित जवादञ्चदुच्चैः श्रवस्कं
   जातक्षोभं विमथ्नन् दिशि दिशि दिविषद्वाहिनीशं क्षणेन।
भ्राम्यन् सव्यापसव्यं सुमहति मिषति स्वर्गिसार्थे सुधार्थं
   प्रेङ्खन्नेत्रः श्रियं नः प्रकटयतु चिरं पक्षवान् मन्थशैलः ॥२०॥
अस्थानेषु ग्रहाणामनियत विहितानन्त वक्रातिचाराः
    विश्वोपाधिव्यवस्था विगम विलुळित प्रागवागादिभेदाः।
द्वित्राः सुत्राम भक्त ग्रह कलह विधावण्डजेन्द्रस्य चण्डाः
    पक्षोत्क्षेपा विपक्ष क्षपण सरभसाः शर्म मे निर्मिमीरन् ॥२१॥
तत्तत्प्रत्यर्थि सारावधि विहित मृषा रोष गन्धो रुषान्धैः
  एकः क्रीडन्ननेकैः सुरपति सुभटैरक्षतो रक्षतान्नः।
अन्योन्याबद्ध लक्षापहरण विहितामन्द मात्सर्यतुङ्गैः
अस्तव्योमान्तमन्तर्हित निखिल हरिन्मण्डलं चण्डभानोः
  लुण्टाकैर्यैरकाण्डे जगदखिलमिदं शर्वरी वर्वरीति।
प्रेङ्खोलत्स्वर्गगोलः स्खलदुडुनिकर स्कन्ध बन्धान् निरुन्धन्
   रंहोभिस्तैर्मदंहो हरतु तरलित ब्रह्मसद्मा गरुत्मान् ॥२३॥
यः स्वाङ्गे संगरान्तर्गरुदनिल लव स्तम्भिते जम्भशत्रौ
   कुण्ठास्त्रे सन्नकण्ठं प्रणयति पवये पक्षलेशं दिदेश ।
सोऽस्माकं संविधत्तां सुरपतिपृतना द्वन्द्व युद्धैक मल्लः
   माङ्गल्यं वालखिल्य द्विजवर
तपसां कोऽपि मूर्तो विवर्तः॥२४॥
रुद्रान् विद्राव्य सेन्द्रान् हुतवहसहितं गन्धवाहं गृहीत्वा
   कालं निष्काल्य धूत्वा निरृति धनपती पाशिनं क्लेशयित्वा।
सर्पाणां छाद्मिकानां अमृतमय पण प्रापणप्राप्त दर्पः
  निर्बाधं क्वापि सर्पन् अपहरतु हरेरौपवाह्य मदंहः ॥२५॥
                   
  नागदमनवर्णकः
 
भुग्न भ्रूर्भ्रूकुटीभृद् भ्रमदमित गरुत्क्षोभित क्ष्मान्तरिक्षः
  चक्राक्षो वक्रतुण्डः खरतरनखरः क्रूरदंष्ट्राकरालः।
पायादस्मान् अपायाद भयभर विगलद्दन्दशूकेन्द्र शूकः
  शौरेः संक्रन्दनादि प्रतिभट पृतना क्रन्दनः स्यन्दनेन्द्रः ॥२६॥
अर्यम्णा धुर्ययोक्त्र ग्रसन भय भृता सान्त्वितोऽनूरुबन्धात्
   कोदण्डज्यां जिघृक्षेदिति चकित धिया शङ्कितः शंकरेण।
तल्पे कल्पेत मा ते मतिरिति हरिणाऽप्यादरेणानुनीतः
   पक्षीन्द्रस्त्रायतां नः फणधर महिषी पत्रभङ्गापहारी ॥२७॥
छायातार्क्ष्यानहीनां फणमणि मुकुरश्रेणि विस्पष्टबिम्बान्
   त्राणापेक्षा धृत स्वप्रतिकृति मनसा वीक्ष्य जातानुकम्पः।
तेषां दृष्ट्वाऽथ चेष्टाः प्रति गरुड गणा शङ्कया तुङ्गरोषः
   सर्पन् दर्पोद्धतो नः शमयतु दुरितं सर्प सन्तानहन्ता  ॥२८॥
उच्छ्वासाकृष्ट तारागण घटित मृषा मौक्तिकाकल्प शिल्पः
   पक्ष व्याधूत पाथोनिधि कुहर गुहा गर्भदत्तावकाशः।
दृष्टिं दंष्ट्राग्र दूतीं पृथुषु फणभृतां प्रेषयन्नुत्तमाङ्गे-
   ष्वङ्गैरङ्गानि रुन्धन्नवतु पिपतिषुः पत्रिणामग्रणीर्नः॥२९॥
आवेधः सौधशृङ्गादनुपरत गतेराभुजङ्गेन्द्रलोकात्
   श्रेणी बन्धं वितन्वन् क्षण परिणमितालात पातप्रकारः।
पायान्नः पुण्यपापप्रचयमय पुनर्गर्भ कुम्भीनिपातात्
   पाताळस्यान्तराळे बृहति खगपतेर्निर्विघातो निपातः ॥३०॥
प्रत्यग्राकीर्ण  तत्तत्फण मणिनिकरे शङ्कुला
कोटि वक्रं
   तुण्डाग्रं संक्ष्णुवानः कुलगिरि कठिने कर्परे कूर्मभर्तुः।
पाताल क्षेत्र पक्व द्विरसन पृतना शालि विच्छेद शाली
   शैलीं नः सप्तशैली लघिमद रभसः सौतु साध्वीं सुपर्णः ॥३१॥
    पर्यवदस्यत् पन्नगीनां युगपदसमयानर्भकान् गर्भकोशाद्
      ब्रह्म स्तंब प्रकम्प व्यतिषजदखिलोदन्वदुन्निद्र घोषम्।
    भृक्षुश्चक्षुः श्रुतीनां सपदि बधिरयन् पातु पत्रीश्वरस्य
        क्षिप्र क्षिप्त क्षमाभृत् क्षणघटित नभः स्फोटमास्फोटितं नः ॥३२॥
    तोय स्कन्धो न सिन्धोः समघटत मिथः पक्ष विक्षेप भिन्नः
        पाताळं न प्रविष्टं पृथुनि च विवरे रश्मिभिस्तिग्मरश्मेः।
    तावद्ग्रस्ताहि वक्त्र क्षरित विषमषी पङ्क कस्तूरिकाङ्कः
          प्रत्यायातः स्वयूथ्यैः स्थित इति विदितः पातु पत्रीश्वरो नः ॥३३॥
     बद्धस्पर्धैरिव स्वैर्बहुभिरभिमुखैरेककण्ठं  स्तुवाने
          तत्तद्विश्वोपकार प्रणयि सुरगण प्रार्थित प्राणरक्षे।
     पायान्नः प्रत्यहं ते कमपि विषधरं प्रेषयामीति भीते
           संधित्सौ सर्पराजे सकरुणमरुणानन्तरं धाम दिव्यम् ॥३४॥
       क्वाप्यस्थ्ना शर्कराढ्यं क्वचन घनतरासृक्छटा शीधुदिग्धं
            निर्मोकैः क्वापि कीर्णं विषयमपरतो मण्डितं रत्नखण्डैः।
        अध्यारूढैः स्ववारेष्वहमहमिकया वध्य वेषं दधानैः
            काले खेलन् भुजङ्गैः कलयतु कुशलं काद्रवेयान्तको नः ॥३५॥
                            परिष्कारवर्णकः
         वामे वैकुण्ठ शय्या फणिपति कटको वासुकि ब्रह्मसूत्रः
              रक्षेन्नस्तक्षकेण ग्रथित कटितटश्चारु कार्कोट हारः।
          पद्मं कर्णेऽपसव्ये प्रथिमवति महा पद्ममन्यत्र बिभ्रत्
              चूडायां शङ्खपालं गुळिकमपि भुजे दक्षिणे पक्षिमल्लः ॥३६॥
           वर्त्त्याभ स्वस्तिकाग्र स्फुरदरुण शिखा दीप्र रत्नप्रदीपैः
                बध्नद्भिस्तापमन्तर्बहुलविषमषी गन्ध तैलाभिपूर्णैः।
           नित्यं नीराजनार्थं निज फण फलकैर्घूर्णमानानि तूर्णं
                भोगैरापूरयेयुर्भुजगकुलरिपोर्भूषणानीषणां नः ॥३७॥ 
      
          अङ्गप्रत्यङ्ग लीनामृतरसविसर स्पर्शलोभादिवान्त-
             स्त्रासाद्ध्रासानुबन्धादिव सहज मिथोवैर शङ्कोत्तराङ्गात्।
          रुद्रागाढोपगूढोच्छ्वसन निबिडित स्थान योगादिवास्मद्-
             भद्राय स्युर्भजन्तो भगवति गरुडे गाढतां गूढपादः ॥३८॥
          कोटीरे रत्नकोटि प्रतिफलिततया नैकधा भिन्नमूर्तिः
             वल्मीकस्थान् स्वयूथ्यानभित इव निजैर्वेष्टनैः कॢप्तरक्षः।
          क्षेमं नः सौतु हेमाचल विधृत शरन्मेघ लेखानुकारी
             रोचिश्चूडाल चूडामणिरुरग रिपोरेष चूडाभुजङ्गः ॥३९॥
          द्राघीयः कर्णपाश द्युति परिभवन व्रीळयेव स्वभोगं
             संक्षिप्याश्नन् समीरं दरविनतमुखो निःश्वसन् मन्दमन्दम्।
          आसीदद्गण्डभित्ति प्रतिफलन मिषात् क्वापि गूढं विविक्षुः
             क्षिप्रं दोषान् क्षिपेन्नः खगपति कुहना कुण्डलः कुण्डलीन्द्रः ॥४०॥
          वालाग्रग्रन्थि बन्धग्रथित पृथुशिरो रत्न सन्दर्शनीयः
               मुक्ताशुभ्रोदराभो हरिमणिशकल श्रेणि दृश्येतरांशः।
          विष्वग्दम्भोलि धारा व्रण किण विषमोत्तम्भन स्तब्ध वृत्तिः
               व्याहारस्य हृद्यो हरतु स मदघं हार दर्वीकरेन्द्रः ॥४१॥
                 
       
       वैकक्ष्य स्रग्विशेषच्छुरणपरिणमच्छस्त्र  बन्धानुबन्धः
          वक्षः पीठाधिरूढो भुजगदमयितुर्ब्रह्मसूत्रायमाणः।
       अश्रान्त स्वैर निद्रा विरचित विविधोच्छ्वास निःश्वास वेग-
          क्षामोच्छूनाकृतिर्नः क्षपयतु दुरितं कोऽपि कद्रू कुमारः ॥४२॥
          श्लिष्यद्रुद्रासुकीर्ति स्तन तट घुसृणालेप संक्रान्तसार-
             स्फारामोदाभिलाषोन्नमित पृथुफणा चक्रवाळाभिरामः।
           प्रायः प्रेयः पटीरद्रुम विटप धिया श्लिष्ट पक्षीन्द्र बाहुः
             व्याहन्यादस्मदीयं वृजिनभरमसौ वृन्दशो दन्दशूकः ॥४३॥  
            ग्रस्तानन्तर्निविष्टान् फणिन इव शुचा गाढमाश्लिष्यदुःख्यन्
                क्षुण्णानेकः स्वबन्धून् क्षुधमिव कुपितः पीडयन् वेष्टनेन।
             व्याळस्तार्क्ष्योदरस्थो विपुलगलगुहावाहि फूत्कारवात्या
                पौनःपुन्येन हन्यात् पुनरुदरगुहागेहवास्तव्यतां नः ॥४४॥
            गाढासक्तो गरुत्मत्कटितट निकटे रक्त चण्डातकाङ्के 
                फक्कत्काञ्ची महिम्ना फणमणि महसा लोहिताङ्गो भुजङ्गः।
            सत्ता सांसिद्धिकं नः सपदि बहुविधं  कर्मबन्धं निरुन्ध्यात्  
                विन्ध्याद्र्यालीन सन्ध्या घन घटित तटित्कान्ति चातुर्य धुर्यः॥४५॥
                              अद्भुतवर्णकः
           
 वेगोत्तानं वितानं व्यजनमनुगुणं वैजयन्ती जयन्ती
    मित्रं नित्याभ्यमित्रं युधि विजयरथो युग्ययोगानपेक्षः।
दासो निष्पर्युदासो दनु तनय भिदो निःसहाय सहायः
     दोधूयेतास्मदीयं दुरितमधरिताराति पक्षैः स्वपक्षैः॥४६॥
उक्षा दक्षान्तकस्य स्खलति वलजितः कुञ्जरः खंजरीतिः
   क्लान्तो धातुः शकुन्तोऽनुग  इति दयया सामि रुद्धस्यदोऽपि।
ग्राहग्रस्त द्विपेन्द्र क्षति भय चकिताकुण्ठवैकुण्ठ चिन्ता-
   नासीरोदार मूर्तिर्नरक विहतये स्याद्विहङ्गेश्वरो नः ॥४७॥
                               
वेगोद्वेलः सुवेले किमिदमिति मिथो मन्त्रितो वानरेन्द्रैः
    मायामानुष्य लीलामभिनयति हरौ लब्धसेवा विशेषः।
वैदेही कर्णपूर स्तबक सुरभिणा यः समाश्लेषि दोष्णा
    तृष्णा पारिप्लवानां स भवतु गरुडो दुःख वारिप्लवो नः॥४८॥
 
दुग्धोदन्वत्प्रभूतःस्वक महिम पृथुर्विष्णुना कृष्णनाम्ना
    पिञ्छाकल्पानुकल्पः समघटि सुदृढो यत्प्रदिष्टः किरीटः।
वीरो वैरोचनास्त्र व्रण किण गुणितोदग्र निर्घात घातः
     संघातं सर्पघाती स हरतु महतामस्मदत्याहितानाम् ॥४९॥
रुन्ध्यात् संवर्त संध्या घनपटल कनत्पक्ष विक्षेप हेला-
    वातूलास्फाल तूलाञ्चल निचय तुलाधेय दैतेय लोकः।
आस्माकैः कर्म पाकैरभिगत महितानीकमप्रत्यनीकैः
     दीव्यन् दिव्यापदानैर्दनुज विजयिनो वैजयन्ती शकुन्तः ॥५०॥
यत्पक्षस्था त्रिवेदी त्रिगुण जलनिधिर्लंङ्घ्यते यद्गुणज्ञैः
    वर्गस्त्रैवर्गिकाणां गतिमिह लभते नाथवद् यत्सनाथः।
त्रैकाल्योपस्थितात् स त्रियुग निधिरघादायतात् त्रायतां नः
    त्रातानेकस्त्रिधाम्नस्त्रिदशरिपु चमू मोहनो वाहनेन्द्रः ॥५१॥
सैकां पञ्चाशतं यामतनुत विनता नन्दनं नन्दयिष्यन्
   कृत्वा मौलौ तदाज्ञां कवि कथक घटाकेसरी वेङ्कटेशः।
तामेतां शीलयन्तः शमित विषधरव्याधि दैवाधिपीडाः
   काङ्क्षा पौरस्त्य लाभाः कृतमितर फलैस्तार्क्ष्यकल्पा भवन्ति ॥५२॥
       
               ॥इति श्रीगुरुडपञ्चाशत् समाप्ता॥
              कवितार्किकसिंहाय कल्याणगुणशालिने।
              श्रीमते वेङ्कटेशाय वेदान्तगुरवे नमः ॥

Sri P R Ramamurthy Ji was the author of this website. When he started this website in 2009, he was in his eighties. He was able to publish such a great number of posts in limited time of 4 years. We appreciate his enthusiasm for Sanskrit Literature. Authors story in his own words : http://ramamurthypr1931.blogspot.com/

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