HYMNS TO VISHNU – SRI VISHNU BHUJANGAPRAYATA STOTRAM

८. श्री विष्णुभुजङ्गप्रयातस्तॊत्रम्
        (श्री शंकराचार्यकृतम्)
चिदंशं विभुं निर्मलं निर्विकल्पम्
निरीहं निराकारमॊङ्कारवॆद्यम् ।
गुणातीतमव्यक्तमॆकं तुरीयम्
परं ब्रह्म यं वॆद तस्मै नमस्तॆ ॥ १ ॥
विशुद्धं शिवं शान्तमाद्यन्तशून्यम्
जगज्जीवनं ज्यॊतिरानन्दरूपम् ।
अदिग्दॆशकालव्यवच्छॆदनीयम्
त्रयी वक्ति यं वॆद तस्मै नमस्तॆ ॥ २ ॥
महायॊगपीठॆ परिभ्राजमानॆ
धरण्यादितत्वात्मकॆ शक्तियुक्तॆ ।
गुणाहस्करॆ वह्निबिम्बार्कमध्यॆ
समासीनमॊंकर्णिकॆऽष्टाक्षराब्जॆ ॥ ३ ॥
समानॊदितानॆकसूर्यॆन्दुकॊटि-
प्रभापूरतुल्यद्युतिं दुर्निरीक्ष्यम् ।
न शीतं न चॊष्णं सुवर्णावभातम्
प्रसन्नं सदानन्दसंवित्स्वरूपम् ॥ ४ ॥
सुनासापुटं सुन्दरभ्रूललाटम्
किरीटॊचिताकुञ्चितस्निग्धकॆशम् ।
स्फुरत्पुण्डरीकाभिरामायताक्षम्
समुत्फुल्लरत्नप्रसूनावतंसम् ॥ ५ ॥
स्फुरत्कुण्डलामृष्टगण्डस्थलान्तम्
जपारागचॊराधरं चारुहासम् ।
कलिव्याकुलामॊदिमन्दारमालम्
महॊरस्फुरत्कौस्तुभॊदारहारम् ॥ ६ ॥
सुरत्नाङ्गदैरन्वितं बाहुदण्डैः
चतुर्भिश्चलत्कङ्कणालंकृताग्रैः ।
उदारॊदरालंकृतं पीतवस्त्रम्
पदद्वन्द्वनिर्धूतपद्माभिरामम् ॥ ७ ॥
स्वभक्तॆषु सन्दर्शिताकारमॆवम्
सदा भावयन् सन्निरुद्धॆन्द्रियाश्वः ।
दुरापं नरॊ याति संसारपारम्
परस्मै तमॊभ्यॊऽपि तस्मै नमस्तॆ ॥ ८ ॥
श्रिया शातकुंभद्युतिस्निग्धकान्त्या
धरण्या च दूर्वादलश्यामलाङ्ग्या ।
कलत्रद्वयॆनामुना तॊषिताय
त्रिलॊकीगृहस्थाय विष्णॊ नमस्तॆ ॥ ९ ॥
शरीरं कलत्रं सुतं बन्धुवर्गम्
वयस्यं धनं सद्म भृत्यं भुवं च ।
समस्तं परित्यज्य हा कष्टमॆकॊ
गमिष्यामि दुःखॆन दूरं किलाहम् ॥ १० ॥
जरॆयं पिशाचीव हा जीवितॊ मॆ
मृजामस्थिरक्तं च मांसं बलं च ।
अहॊ दॆव सीदामि दीनानुकम्पिन्
किमद्धापि हन्त त्वयॊद्भासितव्यम् ॥ ११ ॥
कफव्याहतॊष्णॊल्बणश्वासवॆग-
व्यथाविस्फुरत्सर्वमर्मास्थिबन्धाम् ।
विचिन्त्याहमन्त्यामसह्यामवस्थाम्
बिभॆमि प्रभॊ किं करॊमि प्रसीद ॥ १२ ॥
लपन्नच्युतानन्त गॊविन्द विष्णॊ
मुरारॆ हरॆ नाथ नारायणॆति ।
यथाऽनुस्मरिष्यामि भक्त्या भवन्तम्
तथा मॆ दयाशील दॆव प्रसीद ॥ १३ ॥
नमॊ विष्णवॆ वासुदॆवाय तुभ्यम्
नमॊ नारसिंहस्वरूपाय तुभ्यम् ।
नमः कालरूपाय संहारकर्त्रॆ
नमस्तॆ वराहाय भूयॊ नमस्तॆ ॥ १४ ॥
नमस्तॆ जगन्नाथ विष्णॊ नमस्तॆ
नमस्तॆ गदाचक्रपाणॆ नमस्तॆ ।
नमस्तॆ प्रपन्नार्तिहारिन् नमस्तॆ
समस्तापराधं क्षमस्वाखिलॆश ॥ १५ ॥
मुखॆ मन्दहासं नखॆ चन्द्रभासम्
करॆ चारुचक्रं सुरॆशादिवन्द्यम् ।
भुजङ्गॆ शयानं भजॆ पद्मनाभम्
हरॆरन्यदैवं न मन्यॆ न मन्यॆ ॥ १६ ॥
भुजन्ङ्गप्रयातं पठॆद्यस्तु भक्त्या
समाधाय चित्तॆ भवन्तं मुरारॆ ।
स मॊहं विहायाशु युष्मत्प्रसादात्
समाश्रित्य यॊगं व्रजत्यच्युतं त्वाम् ॥ १७ ॥

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