ATMA PANCHAKAM

                                                आत्मपञ्चकम्
नाहं देहो नेन्द्रियाण्यन्तरंगं
नाहंकारः प्राणवर्गो न बुद्धिः
दारापत्यक्षेत्रवित्तादिदूरः
साक्षी नित्यः प्रत्यगात्मा शिवोऽहम् ॥१॥
रज्ज्वज्ञानाद्भाति रज्जुर्यथाहिः
स्वात्माज्ञानादात्मनो जीवभावः।
आप्तोक्त्या हि भ्रान्तिनाशे स रज्जु-
र्जीवो नाहं देशिकोक्त्या शिवोऽहम् ॥२॥
आभातीदं विश्वमात्मन्यसत्यं
सत्यज्ञानानन्दरूपे विमोहात् ।
निद्रामोहात् स्वप्नवत् तन्नसत्यं
शुद्धः पूर्णो नित्य एकः शिवोऽहम् ॥३॥
मत्तो नान्यत् किञ्चिदत्रास्ति विश्वं
सत्यं बाह्यं वस्तुमायोपक्लिप्तं ।
आदर्शान्तर्भासमानस्यतुल्यं
मय्यद्वैते भाति तस्माच्छिवोऽहम् ॥४॥
नाहं जातो न प्रवृद्धो न नष्टो
देहस्योक्ताः प्राकृताः सर्वधर्माः।
कर्तृत्वादिश्चिन्मयस्यास्ति नाहं-
कारस्यैव  ह्यात्मनो मे शिवोऽहम् ॥५॥
नाहं जातो जन्ममृत्यू कुतो मे
नाहं प्राणः क्षुत्पिपासे कुतो मे ।
नाहं चित्तं शोकमोहौ कुतो मे
नाहं कर्ता बन्धमोक्षौ कुतो मे ॥६॥


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1 Comment on ATMA PANCHAKAM

  1. PP says:

    the service you have done to Hindu society is immeasurable. pl keep it up.