DAKSHINAMURTI STOTRAM-3

         दक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् -३
सुनिर्मलज्ञानसुखैकरूपं  प्रज्ञानहेतुं परमार्थदायिनम्।
चिदंबुधौ तं विहरन्तमाद्यं आनन्दमूर्तिं गुरुराजमीडे ॥१॥
                                     
यस्यान्तं नादिमध्यं न हि करचरणं नाम गोत्रं न सूत्रं
नो जातिर्नैव वर्णा न भवति पुरुषो नो नपुंसं न च स्त्री
नाकारं नैवकारं न हि जनिमरणं नास्ति पुण्यं न पापम्
तत्त्वं नो तत्त्वमेकं सहजसमरसं सद्गुरुं तं नमामि ॥२॥
        
अलं विकल्पैरहमेव केवलं
  मयिस्थितं विश्वमिदं
चराचरम्।
इदं रहस्यं मम येन दर्शितं
   स वन्दनीयो गुरुरेव
केवलम् ॥३॥
ओं नमः प्रणवार्थाय 
शुद्धज्ञानैकमूर्तये
निर्मलाय प्रशान्ताय दक्षिणामूर्तये नमः ॥४॥
गुरवे सर्वलोकानां भिषजे भवरोगिणाम्।
निधये सर्वविद्यानां दक्षिणामूर्तये नमः ॥५॥
अङ्गुष्ठतर्जनीयोग मुद्राव्याजेन देहिनाम्।
श्रुत्यर्थं ब्रह्मजीवैक्यं दर्शयन्नोऽवताच्छिवः ॥६॥

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