GAYATRI VANDANA

           श्री गायत्रीवन्दना
ओंकाररूपा त्रिपदात्रयी च
  त्रिदेववन्द्या त्रिदिवाधिदेवी।
त्रिलोककर्त्री त्रितयस्य भर्त्री
   त्रैकालिकी संकलना विधात्री॥१॥
तत्वात्मिके विश्वविलासभूते
    विश्वाश्रये विश्वविकासधामे।
विभूत्यधिष्ठात्रि विभूतिदात्रि
     पदे त्वदीये प्रणतिर्मदीया ॥२॥
भोगत्वभोक्त्री करणस्यकर्त्री
   धात्वव्ययप्रत्ययलिङ्गशून्या।
ज्ञेया न वेद्यैर्न पुराणभेदैः
    ध्येया धिया धारण आदिशक्तिः॥३॥
नित्या सदा सर्वगताप्यलक्ष्या
    विष्णोर्विधेश्शंकरतोऽप्यभिन्ना।
शक्तिस्वरूपा जगतोऽस्य शक्ति-
    र्ज्ञातुं न शक्या करणादिभिस्त्वम्॥४॥
त्यक्तस्त्वयात्यन्तनिरस्तबुद्धि-
   र्नरो भवेत् वैभवभाग्यहीनः।
हिमालयादप्यधिकोन्नतोऽपि
   जनैस्समस्तैरपि लङ्घनीयः ॥५॥
शिवे हरौ ब्रह्मणि भानुचन्द्रयो-
   श्चराचरे गोचरकेऽप्यगोचरे।
सूक्ष्मातिसूक्ष्मे महतो महत्तमे
   कला त्वदीया विमला विराजते॥६॥
सुधामरन्दं तव पादपद्मं
   स्वे मानसे धारणया निधाय।
बुद्धिर्मिलिन्दी भवतान्मदीया
   नातः परं देवि वरं समीहे ॥७॥
दीनेषु हीनेषु गतादरेषु
   स्वाभाविकी ते करुणा प्रसिद्धा
अतः शरण्ये शरणं प्रपन्नं
    गृहाण मातः प्रणवाञ्जलिं मे ॥८॥

  

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