INDRAKRITA SRI MAHALAKSHMI STOTRAM

इन्द्रकृत श्री महालक्ष्मी स्तोत्रम् 
   (देवी भागवतंम् ९,४३)
पुरन्दर उवाच-
   नमः कमलवासिन्यै नारायण्यै नमो नमः।
   कृष्णप्रियायै सततं महालक्ष्म्यै नमो नमः ॥१॥
  
   पद्मपत्रेक्षणायै च पद्मास्यायै नमो नमः।
   पद्मासनायै पद्मिन्यै वैष्णव्यै च नमो नमः ॥२॥
   सर्व संपत्स्वरूपिण्यै सर्वाराध्यै नमो नमः।
   हरिभक्तिप्रदात्र्यै च हर्षदात्र्यै नमो नमः ॥३॥
   कृष्णवक्षःस्थितायै च कृष्णेशायै नमो नमः।
   चन्द्रशोभास्वरूपायै च रत्नपद्मे च शोभने॥४॥
 
   सम्पत्यधिष्ठातृ देव्यै महादेव्यै नमो नमः।
   नमो वृत्तिस्वरूपायै वृत्तिदायै नमो नमः॥५॥
   वैकुण्ठे या महालक्ष्मीः या लक्ष्मीः क्षीरसागरे।
   स्वर्गलक्ष्मीरिन्द्रगेहे राजलक्ष्मीर्नृपालये ॥६॥
   गृहलक्ष्मीश्च गृहिणां गेहे च गृहदेवता
   सुरभिः सागरे जाता दक्षिणा यज्ञगामिनी॥७॥
   अदितिर्देवमाता त्वं  कमला कमलालया।
   स्वाहा त्वं च हविर्दाने कव्यदाने स्वधा स्मृता ॥८॥
   त्वं हि विष्णुस्वरूपा च सर्वाधारा वसुन्धरा।
   शुद्धसत्त्वस्वरूपा त्वं नारायणपरायणा॥९॥
   क्रोधहिंसावर्जिता च वरदा शारदा शुभा।
   परमार्थप्रदा त्वं च हरिदास्यप्रदा परा  ॥१०॥
    यया विना जगत्सर्वं भस्मीभूतमसारकम्।
    जीवन्मृतं च विश्वं च शश्वत्सर्वं यया विना ॥११॥
    सर्वेषाञ्च परा माता सर्वबान्धवरूपिणी।
    धर्मार्थकाममोक्षाणां त्वं च कारणरूपिणी॥१२॥    
     यथा माता स्तनान्धानां शिशूनां शैशवे सदा।
     तथा त्वं सर्वदा माता सर्वेषां सर्वरूपतः ॥१३॥
     मातृहीनः स्तनान्धस्तु स च जीवति दैवतः।
     त्वया हीनो जनः कोऽपि न जीवत्येव निश्चितम् ॥१४॥
      सुप्रसन्नस्वरूपा त्वं मयि प्रसन्ना भवाम्बिके।
      वैरिग्रस्तं च विषयं देहि मह्यं सनातनी ॥१५॥
       अहं यावत् त्वया हीनॊ बन्धुहीनश्च भिक्षुकः।
       सर्वसंपद्विहीनश्च तावदेव हरिप्रिये ॥१६॥
      
       ज्ञानं देहि च धर्मं च सर्वसौभाग्यमीप्सितम्।
       प्रभावं च प्रतापं च सर्वाधिकारमेव च ॥१७॥
       जयं पराक्रमं युद्धे परमैश्वर्यमेव च ।
       इत्युक्त्वा च महेन्द्रश्च सर्वैस्सुरगणैस्सह॥१८॥

       प्रणनाम साश्रुनेत्रो मूर्ध्ना चैव पुनः पुनः।
       ब्रह्मा च शङ्करश्चैव शेषो धर्मश्च केशवः॥१९॥
        सर्वे चक्रुः परीहारं सुरार्थे च पुनः पुनः।
        देवेभ्यश्च  वरं दत्वा पुष्पमालां सुमनोहरम् ॥२०॥
         केशवाय ददौ लक्ष्मीः सन्तुष्टा सुरसंसदि।
         ययुर्देवाश्च सन्तुष्टाः स्वं स्वं स्थानं च नारद॥२१॥
        
          देवी ययौ हरेः स्थानं हृष्टा क्षीरोदशायिनः ।
          ययतुश्चैव स्वगृहं ब्रह्मेशानौ च नारद ॥२२॥
          दत्त्वा शुभाशिषं तौ च देवेभ्यः प्रीतिपूर्वकम्।
          इदं स्तोत्रं महापुण्यं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ॥२३॥
          कुबेरतुल्यः स भवेत् राजराजेश्वरो महान्।
           पञ्चलक्षजपेनैव स्तोत्रसिद्धिः भवेन्नृणं॥२४॥
          
           सिद्ध स्तोत्रं यदि पठेत् मासमेकन्तु सन्ततम्।
           महासुखी च राजेन्द्रो भविष्यति न संशयः॥२५॥
   इति श्रीदेवीभागवते महापुराणे अष्तादशसाहस्र्यां संहितायां नवम स्कन्धे
         महालक्ष्म्या ध्यानस्तोत्रवर्णनं नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः                                      

Sri P R Ramamurthy Ji was the author of this website. When he started this website in 2009, he was in his eighties. He was able to publish such a great number of posts in limited time of 4 years. We appreciate his enthusiasm for Sanskrit Literature. Authors story in his own words : http://ramamurthypr1931.blogspot.com/

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