SARASWATI STOTRAM -5

   सरस्वतीस्तोत्रम्-५
          ( श्रीहरिहरशर्मा विरचितम्)
गुरुवन्दना-
अज्ञानाब्धिनिमग्नभौतिकतनूनुत्तार्य चिन्नौकया
शिष्यांल्लोकहितङ्करान् कुशलिनः कुर्यात् कटाक्षेण यः।
सत्यं ब्रह्म निदानगीर्भिरनिशं मिथ्या जगच्च ब्रुव-
ञ्छङ्कापङ्किलमानसाब्जसदने हंसो गुरुः सीदतु॥
श्री सद्गुरुचरणारविन्दाभ्यां नमः
     अथ सरस्वतीस्तोत्रम् (कुसुममञ्जरीवृत्तम्)
छ्त्रचामरविराजिते निजयशःप्रकाशितदिशान्तरे
     गात्रकान्तिपरिधूतशम्बररिपुप्रिये विधिमनः प्रिये।
अर्धचन्द्रफणिभूषणाङ्कितसुवर्णरत्नमकुटोज्ज्वले
    ध्वंसयाऽघमव मां सरस्वति सुवाक्‍प्रबोधमपि मे दिश ॥१॥
नीरदाभचिकुरान्तरालधृतदीर्घकुङ्कुमसुलेखने
    स्वर्णवर्णनिजफालदेशलसदुद्यदर्कतिलकाञ्चिते।
भक्तमानससमीपकर्षणचणं तवाऽम्ब करुणेक्षणं
    पातयाऽऽशु मयि सेवके नतजनार्तिभञ्जनि परात्परे ॥२॥
शुक्ररश्मिगणदर्पहारिरुचिनासिकाभरणभासुरे
     दर्पणायितकपोलबिम्बितसुशोभिकर्णमणिकुण्डले।
पुष्पवन्तरुचितप्तहेमकृतगण्डभूषणविराजिते
     ब्राह्मि माङ्गलिकसूत्रधारिणि नतेष्टमङ्गलवरप्रदे ॥३॥
चूतपत्ररसने सुभाषिणि सुपक्वबिम्बरुचिराधरे
   दन्तकान्तिमृदुमन्दहासजित कुन्दशारदविधुप्रभे।
वेदशास्त्रसकलाक्षरालयचतुर्मुखप्रियकुटुम्बिनि
   त्वत्कृपा यदि न चेदिदं जगदशेषमेव जडतां व्रजेत् ॥४॥
पुस्तकामृतघटाक्षमालिकाश्चिन्मयीमपि सुमुद्रिकां
   कङ्कणाङ्गुलिसुभूषणाञ्चितकरारविन्दनिकरै धृते।
ब्रह्मसूत्रधरि वागधीश्वरि महेशसोदरि विदां वरे
   सत्वरं  प्रणमदन्धमूकगणदृष्टिभाषणविधायिके
॥५॥
रुक्मरत्नकलहंसचिह्नितदुकूलचेलमृदुकञ्चुके
   कुञ्जरेन्द्रकलशस्तने
सुतनु निर्जरीगणपरीवृते ।
गन्धपङ्कमृगनाभिकुङ्कुमसुलेपनोल्लसितमानसे
   शान्तिरस्त्वनपगामिनि मनाश्चिन्तनात्तसुखफलोदयम्॥६॥
रत्नहेमसुमालिकाङ्गदसुभूषितांसगळशोभने
    तप्तकाञ्चनसुशोभिरत्नमणिमेखलावृतकटीतटे।
किङ्किणीक्वणननूपुराभरणराजमानचरणाम्बुजे
    हृत् त्वदीय पुरुषार्थदायकपदब्जयुग्मनिलयं सदा॥७॥
             ॥शुभम्॥                
          

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