SRI SITA ASHTOTTARASATANAMA STOTRAM

    श्री सीता अष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्

सीता पतिव्रता देवी मैथिली जनकात्मजा।
अयोनिजा वीर्यशुल्का शुभा सुरसुतोपमा ॥१॥
विद्युत्प्रभा विशालाक्षी नीलकुञ्चितमूर्धजा।
अभिरामा महाभागा सर्वाभरणभूषिता ॥२॥
पूर्णचन्द्रानना रामा धर्मज्ञा धर्मचारिणी।
पतिसम्मानिता सुभ्रूः प्रियार्हा प्रियवादिनी॥३॥
शुभानना शुभापाङ्गी शुभाचारा यशस्विनी।
मनस्विनी मत्तकाशिन्यनघा च तपस्विनी॥४॥
धर्मपत्नी च वैदेही जानकी मदिरेक्षणा।
तापसी धर्मनिरता नियता ब्रह्मचारिणी ॥५॥
मृदुशीला चारुदती चारुनेत्रविलासिनी।
उत्फुल्ललोचना कान्ता भर्तृवात्सल्यभूषणा॥६॥
स्वभावतनुका साध्वी  पद्माक्षी पङ्कजप्रिया।
विचक्षणाऽनवद्याङ्गी मृदुपूर्वाभिभाषिणी॥७॥
अक्लिष्टमाल्याभरणा वरारोहा वराङ्गना
सती कमपत्राक्षी मृगशावनिभेक्षणा  ॥८॥
महाकुलीना बिम्बोष्ठी पीतकौशेयवासिनी
वीरपार्थिवपत्नी च विशुद्धा विनयान्विता॥९॥
सुकुमारी सुमध्या च सुभगा सुप्रतिष्ठिता
सर्वांगगुणसंपन्ना सर्वलोकमनोहरा ॥१०॥      
        
तरुणादित्यसङ्काशा तप्तकाञ्चनभूषणा।
सत्यव्रतपरा चैव वरा हरिणलोचना॥११॥
श्यामा विशुद्धभावा च रामपादानुवर्तिनी।
यशोधना उदारशीला विमला क्लेशनाशिनी॥१२॥
अनिन्दिता सुवृत्ता च रामस्य हृदयप्रिया।
आर्या च सुविभक्ताङ्गी विनाभरणशोभिनी॥१३॥
मान्या कान्तस्मिता चैव कल्याणी रुचिरप्रभा।
स्निग्धपल्लवसङ्काशा जाम्बूनदसमप्रभा॥१४॥
अमला शीलसंपन्ना इक्ष्वाकुकुलनन्दिनी।
भद्रा शुद्धसमाचारा वरार्हा तनुमध्यमा ॥१५॥
प्रियकाननसञ्चारा सुकेशी चारुहासिनी।
हेमाभा राजमहिषी शोभना राघवप्रिया ॥१६॥
अष्टोत्तरशतं देव्याः सीतायाः
स्तोत्रमुत्तमम्।
यः पठेच्छृणुयाद्वापि
सर्वान्कामानवाप्नुयात्॥१७॥   

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