SRI SHARADA BHUJANGAPRAYATA STUTIH

                   श्रीशारदाभुजङ्गप्रयातस्तुतिः
( शृङ्गेरि श्रीजगद्गुरु श्रीसच्चिदानन्दशिवाभिनव-
      नृसिंहभारतीस्वामिभिः विरचिता)
स्मितोद्धूतराकानिशानायकायै
   कपोलप्रभानिर्जितादर्शकायै।
स्वनेत्रावधूताङ्गजातध्वजायै
   सरोजोत्थसत्यै नमः शारदायै॥१॥
भवाम्भोधिपारं नयन्त्यै स्वभक्ता-
     न्विनायासलेशं
कृपानौकयैव।
भवाम्भोजनेत्रादिसंसेवितायै
     अजस्रं हि कुर्मो नमः शारदायै॥२॥  
सुधाकुम्भमुद्राविराजत्करायै
     व्यथाशून्यचित्तैः
सदा सेवितायै।
क्रुधाकामलोभादिनिर्वापणायै
     विधातृप्रियायै
नमः शारदायै॥३॥
नतेष्टप्रदानाय भूमिं गतायै
    गतेनाच्छबर्हाभिमानं
हरन्त्यै।
स्मितेनेन्दुदर्पं च तोषं व्रजन्त्यै
    सुतेनेव नम्रैर्नमः
शारदायै ॥४॥
नतालीयदारिद्र्यदुःखापहन्त्र्यै
    तथा भीतिभूतादिबाधाहरायै।                              
फणीन्द्राभवेण्यै गिरीन्द्रस्तनायै
    विधातृप्रियायै
नमः शारदायै॥५॥
सुधाकुम्भमुद्राक्षमालाविराज-
   त्करायै कराम्भोजसंमर्दितायै
सुराणां वराणां सदा मानिनीनां
   मुदा सर्वदा ते
नमः शारदायै ॥६॥
समस्तैश्च वेदैः सदा गीतकीर्त्यै
  निराशान्तरङ्गाम्बुजातस्थितायै।
पुरारातिपद्माक्षपद्मोद्भवाद्यै-
   र्मुदा पूजितायै
नमः शारदायै॥७॥
अविद्यापदुद्धारबद्धादरायै
    तथा बुद्धिसंपत्प्रदानोत्सुकायै।
नतेभ्यः कदाचित्स्वपादाम्बुजाते
    विधेः पुण्यवत्यै
नमः शारदायै॥८॥
पदाम्भोजनम्रान्कृते भीतभीता-
  न्द्रुतं मृत्युभीतेर्विमुक्तान्विधातुम्।
सुधापूर्णकुम्भं करे किं विधत्से
   द्रुतं पाययित्वा यथातृप्ति वाणि ॥९॥
महान्तो हि मह्यं हृदम्भोरुहाणि
   प्रमोदात्समर्प्यासते
सौख्यभाजः।
इति ख्यापनायानतानां कृपाब्धे
   सरोजान्यसंख्यानि
धत्से किमम्ब॥१०॥
   
शरच्चन्द्रनीकाशवस्त्रेण वीता
     कनद्भर्मयष्टेरहङ्कारभेत्त्री।
किरीटं सताटङ्कमत्यन्तरम्यं
     वहन्ती हृदब्जे
स्फुरत्वम्ब मूर्तिः ॥११॥
निगृह्याक्षवर्गं तपो वाणि कर्तुं
   न शक्नोमि यस्मादवश्याक्षवर्गः।
ततो मय्यनाथे दया पारशून्या
   विधेया विधातृप्रिये
शारदाम्ब ॥१२॥
कवित्वं पवित्वं द्विषच्छैलभेदे
   रवित्वं नतस्वान्तहृद्ध्वान्तभेदे।
शिवत्वं च तत्त्वप्रबोधे ममाम्ब
   त्वदङ्घ्र्यब्जसेवापटुत्वं
च देहि ॥१३॥
 विलोक्यापि लोको
न तृप्तिं प्रयाति
     प्रसन्नं
मुखेन्दुं कलङ्कादिशून्यम्।
  यदीयं ध्रुवं प्रत्यहं
तां कृपाब्धिं
      भजे शारदाम्बामजस्रं
मदम्बाम् ॥१४॥
  पुरा चन्द्रचूडो
धृताचार्यरूपो
      गिरौ शृङ्गपूर्वे प्रतिष्ठाप्य चक्रे।
  समाराध्य मोदं ययौ
यामपारं
      भजे शारदाम्बामजस्रं
मदम्बाम् ॥१५॥ 
   भवाम्भोधिपारं
नयन्तीं स्वभक्ता-
      न्भवाम्भोजनेत्राजसंपूज्यमानाम्।
   भवद्भव्यभूताघविध्वंसदक्षां
      भजे शारदाम्बामजस्रं
मदम्बाम् ॥१६॥
    वराक त्वरा का
तवेष्टप्रदाने
       कथं पुण्यहीनाय
तुभ्यं ददानि।
   इति त्वं गिरां
देवि मा ब्रूहि यस्मा-
       दघारण्यदावानलेति
प्रसिद्धा ॥१७॥
      इति 
श्रीशारदाभुजङ्गप्रयातस्तुतिः
सम्पूर्णा

Sri P R Ramamurthy Ji was the author of this website. When he started this website in 2009, he was in his eighties. He was able to publish such a great number of posts in limited time of 4 years. We appreciate his enthusiasm for Sanskrit Literature. Authors story in his own words : http://ramamurthypr1931.blogspot.com/

Author Socials Follow me

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.